Sacchi Baatein | सच्ची बातें part-2

Sacchi Baatein | सच्ची बातें  part-2
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Sacchi Baatein | सच्ची बातें part-2

Sacchi Baatein | सच्ची बातें part-2- apne ko jano kaise jane is book m btaya gaya hai

सच्ची बातें                                                                                                11

  • अपने शान्त निःसंकल्प सत् स्वरूप में स्थित रहना सबसे बड़ा “गुण” है।
  • जिस वस्तु का स्वतन्त्र अस्तित्व न हो, वही “मिथ्या” होती है।
  • खाती-पीती, चलती-फिरती मूर्तियों में ईश्वर को देखना ही ‘सच्चा ईश्वर दर्शन’ है।
  • जो तीनों कालों, तीनों अवस्थाओं में “अबाधित’ रहे, वही “परम सत्य” है। इसी परम सत्य वस्तु को परमार्थ कहते हैं।
  • जो जड़-चेतन सभी को अस्तित्व (सत्ता) प्रदान करे, उसी निर्विशेष, निष्क्रिय सद् वस्तु का नाम “आत्मा” (ब्रह्म) है।
  • इसी निष्क्रिय “सद् वस्तु” से अपनी एकता को जानने की इच्छा तथा प्रयत्न न करना “प्रमाद” है।
  •  एक मात्र मोक्ष की इच्छा का नाम शुभेच्छा है।
  • काम-क्रोध, लोभ ही महान “शत्रु” हैं।
  • जो परमात्मतत्त्व का ज्ञान, वैराग्य, भक्ति प्राप्त करने की प्रेरणा दे, सहयोग दे, वही सच्चा भाई, मित्र तथा पुत्रादि है।
  • असहाय, अपाहिज, रोगी, वृद्धजनों अथवा संतों की सेवा ही भगवान् की “सच्ची पूजा” (सेवा) है।
  • ईश्वर कहीं किसी दूर देश में नहीं, सभी के हृदयरूपी “मन्दिर” में सदैव निवास करता है। (गीता-18-61)
  • अज्ञान (अविद्या, माया, मोह) की निवृत्ति जैसे भी हो, वही सच्ची “साधना” है।
  • जो देह तथा वर्ण, आश्रम, कुल, जाति आदि का झूठा अभिमान मिटाने (गलाने) की चेष्टा में लगा हुआ है, वही सच्चा साधक है।

सच्ची बातें                                                                                                    12

  • गुरु, शास्त्र, स्वाध्याय, संन्यास, सत्संग, जप, कीर्तन, पजन पर कथायें, तत्व विचार, मननादि – ये सभी “साधन” हैं, साध्य नहीं।
  • रामचरित मानस ही सच्चा दर्पण है।
  • जीव को मनुष्य शरीर अपने सच्चिदानन्द स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही मिला है, धन सम्पत्ति का संग्रह तथा विषय भोगों को भोगने के लिए नहीं
  • जिसका देह, जाति, कुल, वर्ण, आश्रमादि में ‘अहं’ नहीं रहा है, वही “सच्चा शास्त्रज्ञ” (विद्वान) है।
  • मनुष्य शरीर को कभी भी शुद्ध समझना “नासमझी” है।
  • ‘अहं’ और ‘इदं’ पदार्थों का शोध करने वाला “विवेकी” है।
  • शास्त्रों की बातों व सिद्धान्तों को मनन करने वाला “मुनि” है।
  • तत्त्वज्ञानी गुरु के बचनों और वेदान्त वाक्यों में दृढ़ विश्वास का नाम “श्रद्धा” है।
  • अन्धपरम्परा से किये जाने वाले कार्यों का नाम “श्रद्धा” व भक्ति नहीं है।
  • अन्ध विश्वास का नाम भी “श्रद्धा” नहीं है।
  • दुःखों के संयोग के वियोग का नाम “योग” है।
  • किसी भूखे व्यक्ति की क्षुधा की निवृत्ति करा देना “यज्ञ” है।
  • किसी जीवधारी को भगवान् की छवि (मूर्ति) समझ कर आदर के साथ खिलाना, भगवान् को “भोग” लगाना है।
  • ‘मन-बुद्धि की निर्मलता ही वास्तविक “पवित्रता” है।
  • बुद्धि के साथ आत्मा का तादात्म्य सम्बन्ध “अस्मिता” है।
  • ‘जड़-चेतन’ के विवेक से जीवन व्यतीत करना, बुद्धि की “शुद्धता” है।

सच्ची बातें                                                                                                13

  • किसीप्रकार की श्रेष्ठता के अभिमान में अनावश्यक सेवा लेना “निन्दित” कार्य है।
  • धार्मिक अनुष्ठान (कार्य) के नाम पर ध्वनि प्रदूषण, शोर-गुल, हो-हल्ला आदि करना-कराना “अधर्म” है।
  • मनोनाश होने पर ही ज्ञान पूर्णतया चरितार्थ होता है।
  • धन-सम्पत्ति की तृष्णा ही “दरिद्रता”  है।
  • नासमझी का नाम “अविद्या” है।
  • परमात्मा के साथ एकीभाव में स्थित रहने वाला ही “सिद्ध” पुरुष है।
  • शास्त्रों (उपनिषदों) के सिद्धान्तों का बारम्बार श्रवण-मनन, विचार, अध्ययन ही “सच्चा कुम्भ या गंगा स्नान” है।
  • वेदान्त-शास्त्र एवं “आत्मतत्व” ही भगवान् के “सच्चे चरण” हैं।
  • हठ (आग्रह) बहुत बड़ा “दुर्गुण” है।
  • सद्गुरु से प्राप्त “ज्ञान” ही असली “प्रसाद”  है।
  • अपने कर्तव्य को पालन करने का नाम “धर्म”  है। अपने सत्स्वरूप में स्थित होना परम धर्म है।
  • दुःखों की अत्यान्तिक निवृत्ति एवं परमानन्द की प्राप्ति का नाम “कल्याण” है।
  • शास्त्रों के उपदेशों तथा उनके तात्पर्य को जीवन में ले आना ही सच्चा भजन है।
  • नाम-जप के सभी अधिकारी हैं, परन्तु ज्ञान का अधिकारी मेधावी और विचारवान ही है।
  • निर्जीव, विनाशी, असत् तथा जड़ वस्तुओं के प्रति श्रेष्ठता तथा पूज्य बुद्धि का कारण अविवेक है।

सच्ची बातें                                                                                        14

  • जो जीव पुनर्जन्म के बन्धन में पड़े हैं, वही संसारी कहे जाते हैं।
  • त्याग, तपस्या, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, विवेक तथा विज्ञान, ये 7 बातें जिसके जीवन में हैं, वही सच्चे सन्त हैं।
  • जो जीव आत्मवान् होकर जीवन्मुक्त हो गया है, वही असंसारी कहा जाता है।
  • संसारी लोगों की प्रशंसा अज्ञानी लोग करते हैं। जबकि असंसारी मनुष्य की प्रशंसा श्रीकृष्ण-श्रीराम, संत तथा शास्त्र करते हैं।
  • जो अपने शरीर को नाशवान्, समस्त अशुद्धि का केन्द्र तथा मलमूत्र आदि का भाण्ड समझता है, वही ठीक समझता है।
  • जो बन्धन और मोक्ष का तत्व जानता है, वही पण्डित है।
  • सत्य को छोड़कर कल्पना के राज्य में बढ़िया-बढ़िया ख्याली पुलाव पकाने का नाम मनोराज्य है।
  • ज्ञान का उपदेश देना ही दीक्षा है। परमेश्वर ही अधियज्ञ है। तत्त्ववेत्ता ही सच्चा भाई-बन्धु है। जो सद्गुणों से सम्पन्न है, वही धनी है। जिसके जीवन में असंतोष है, वही दरिद्र है। आत्मलाभ ही उत्तम लाभ है।
  • जो जितेन्द्रिय नहीं है वही निर्बल है।
  • मनुष्य शरीर ही जीव का घर है।
  • चित्त की बहिर्मुखता ही कुमार्ग है।
  • सतोगुण की वृद्धि ही स्वर्ग है। तमोगुण की वृद्धि ही नरक है।
  • शरीर आदि में जिसका मैंपन है, वही मूर्ख है।
  • जिससे जीवात्मा और परमात्मा का भेद मिट जाय, वही सच्ची विद्या है।
  • स्वार्थ बुद्धि का त्याग भी एक महत्वपूर्ण “त्याग” है।

सच्ची बातें                                                                                            15          

  • सरल स्वभाव (झूठ, छल, कपट, अहंकार आदि से रहित) तथा सहजता का जीवन आदर्श जीवन है।
  • कल्पित देश, काल, वस्तु के प्रति ‘सत्यत्व’ एवं ‘महत्व बुद्धि’ होना “अज्ञानता” का लक्षण है।
  • जब तक देश, काल, वस्तु के प्रति ‘सत्यत्व बुद्धि’ रहेगी, तब तक महत्वबुद्धि बनी ही रहेगी। पुनर्जन्म चलता ही रहेगा।
  • मैं” के आश्रित देश, काल, वस्तु अर्थात् जगत् होता है। ‘जगत्’ के आश्रित “मैं” नहीं होता। मैं ‘चेतन’ होता है, जगत् मायाकृत, जड़, विनाशी तथा विकारी होता है।
  • जिस वस्तु में जिस नाम-रूप का अत्यन्ताभाव होता है। वह “मिथ्या” होते हुए भी दिखलाई पड़ती है। यही माया है।
  • ‘अधिष्ठान’ की ‘सत्ता’ में ‘अध्यस्त वस्तु’ भासते हुए भी असत् ही होती है।
  • कारण ही ‘कार्य’ रूप में प्रतीत होता है, कारण से कार्य किंचित मात्र भी प्रथक अस्तित्व नहीं रखता।
  • शुभ कार्यों को करने से यदि कर्तापने का अहंकार बने, तो समझ लेना, वह सभी कार्य अशुभ में परिवर्तित हो रहे हैं।
  • कार्य अथवा अध्यस्त वस्तु वस्तुतः होती ही नहीं है, केवल दिखलाई पड़ती है, यही भगवान् की “माया” है।
  • मैं माने आत्मा, ‘यह’ माने “अनात्मा”। मैं कभी भी यह नहीं हो सकता।
  • जिस कार्य को करने में कर्ता भाव हो (हमने किया) उसे “कर्म” कहते हैं।
  • जिस कार्य को करने में कर्तृत्वाभिमान न हो, वह “अकर्म” है।
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