Sacchi Baatein- सच्ची बातें part-1

Sacchi Baatein- सच्ची बातें  part-1
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

Sacchi Baatein- सच्ची बातें part-1

Sacchi Baatein | सच्ची बातें part-1- apne ko jano kaise jane is book m btaya gaya hai

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥

सच्ची बातें

स्वामी महेशानन्द

तपोवन आश्रम, लवकुश नगर, बिठूर, कानपुर २०९२१७ मो०:9580082032

सच्ची बातें                                                                        2

प्रकाशक: राजेन्द्र द्विवेदी

भारती आश्रम, बिठूर, कानपुर नगर

सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन

विजया दशमी, 2019

दक्षिणा :- 29/- रुपये मात्र

मुद्रक :

आस्था प्रिन्टोक्राफ्टस् सिविल लाइन्स,

 कानपुर

सच्ची बातें                                                                                                      3

ॐ श्री गुरुभ्यो नमः

दो शब्द

अपनी खोज!!

   मन, बुद्धि, चित्त को एकाग्र करके गम्भीरता से विचार करें, कि आँख से आप देखते हैं; या आँख देखती है। नेत्र से दिखाई देने वाले विषय (रूप) का ज्ञान किसे होता है ? कान शब्द को सुनते हैं; या कान के छिद्रों से सुनने वाला कोई और है ? स्वाद को कौन जानता है ? गंध को नाँक जानती है; या और कोई है, जो सुगन्ध-दुर्गन्ध को जानता है। स्पर्श के सुख को कौन जानता है ?

     जाग्रत में पाँचो विषयों शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध के भोग से सुखानुभूति अथवा दुःखानुभूति कौन करता है ? स्वप्न के झूठे दृश्यों को कौन देखता है ? स्वप्न में सुखों व दुःखों को कौन भोगता है ? गहरी नींद के सुख को कौन जानता है ? उस समय तो मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि भी निद्रा में लीन होती हैं। विचार करो कि आप कौन हैं, एक हैं, कि अनेक हैं।

    आप पायेंगे कि हम एक हैं। इन्द्रियाँ तथा उनके विषय अलग-अलग हैं। जिस ज्ञानेन्द्रिय का जो विषय है, वह उसी का ज्ञान करा सकती है, दूसरे विषय का नहीं। विचार करने पर यह भी ज्ञात होगा, कि मन, बुद्धि, शरीर आदि के परिवर्तन को ‘हम’ जानते हैं, इन्द्रियों की शक्ति व सामर्थ्य को भी हम’ जानते हैं। यही स्थिति कर्मेन्द्रियों तथा बाह्य करणों की भी है।

    अतः आप समझ सकते हैं कि मन, बुद्धि, इन्द्रिय तथा शरीरादि हम’ नहीं हैं। यहाँ पर थोड़ा सा स्थूल शरीर के सम्बन्ध में विचार करके देखना पड़ेगा, कि जो शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश के ‘संघात’ से बना है। क्या ये पंचमहाभूत आप हैं? अथवा इनसे बना यह संघात रूप देह आप हैं ? पंचतत्वों से निर्मित देह में हड्डी, माँस, रक्त, खाल, बाल, नस, नाड़ियाँ तथा आँतों आदि में से आप क्या-क्या है? आप इन्हें जानते हैं अथवा ये आपको जानते हैं ?

 इसप्रकार प्रतिदिन बारम्बार विचार करने पर आप इस निश्चय पर पहँचेंगे, कि इनमें से कुछ भी “हम” नहीं हैं । परन्तु आप किसी भी स्थिति, किसी भी परिस्थिति में, यह नहीं कह सकते कि “हम” नहीं हैं।

सच्ची बातें                                                                                                                         4

2.     आपने यह भी सुना होगा कि जड़ वस्तु उसे कहते हैं – जिसे न अपना सा न दूसरे का। चेतन’ उसे कहते हैं, जिसे अपना भी ज्ञान हो तथा अन्य का भी ज्ञान हो।

3.    यदि ऐसा ही कोई समझता है, कि आँख ही रूप देखती है, कान ही शल सुनते हैं, नाँक ही गन्ध का, जीभ ही स्वाद का मजा लेती है; तो स्वस्थ व्यक्ति मृतक शरीर में नेत्र, कान, नासिकादि ज्यों के त्यों बने रहने पर, इन्हें अपने-अपने विषय का ज्ञान क्यों नहीं होता है ? गहरी निद्रा के समय ये इन्द्रियाँ अपने विषय को क्यों नहीं जान पाती हैं?

 विचार नं० 4-      देश (स्थान), काल, वस्तु का ज्ञान स्थूल शरीर को होता है अथवा इसके अंगों को होता है अथवा किसी अन्य को होता है? क्या देश, काल, वस्त की जानकारी एक दूसरे को होती है? क्या इन्हें ये ज्ञान होता है कि हमें कोई जान रहा है अथवा हमारे में आरोपित नाम आदि पर व्यवहार चल रहा है। आप यही कहेंगे कि ‘नहीं’।

        ध्यान रहे कि अपनी खोज आपको ही, अपने से करनी है। किसी दृश्य जड़ पदार्थ से नहीं।स्थूल शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तथा इन्द्रियाँ और करण आदि सभी दृश्य’ हैं। आप इनके दृष्टा (ज्ञाता) हैं। इनके परिवर्तन को भी आप जानते हैं तथा भाव-अभाव को भी आप जानते हैं।

     परिवर्तनशील और दृश्य होने के कारण ही ये सभी ‘जड़’ श्रेणी में आते हैं। क्योंकि जानने और देखने वाला ही “चेतन” होता है। यह सभी शास्त्रों का मुख्य सिद्धान्त है। यह बात कोई भी खूब विचार करके भी समझ सकता है। अब प्रश्न फिर वही उठता है कि “हम” अर्थात् आप कौन हैं, और क्या हैं? इस शरीर आदि से आपका क्या सम्बन्ध है ? मृत्यु किसकी होती है ? जन्म किसका होता है, पुनर्जन्म के बन्धन में त्रैताप के कष्ट कौन भोगता रहता है ? मुक्ति कैसे होती है और किसकी होती है?

ऐसे ही अनेक प्रश्नों का उत्तर पाठकों को इस पुस्तिका में मिल सकता है। इसके साथ ही और भी बहुत सी बातों की वास्तविकता की जानकारी हो सकती है।

अवश्य पढ़ें- धन्यवाद ।

                                                                                       स्वामी चन्द्रेश्वरानन्द

  चित्रकूट अखण्ड आश्रम

 रेलवे स्टेशन, बिठूर, कानपुर

सच्ची बातें                                                                                                      5

सच्ची बातें

शास्त्र कहते हैं :

  • पृथ्वी, जल अग्नि, वायु, आकाश ये “पाँच महाभूत” हैं।
  • शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध – ये “पाँच विषय” हैं।
  • आकाश का गुण “शब्द” है।
  • वायु का गुण “स्पर्श है।
  • अग्नि का गुण “दहकत्व” है। जल का गुण “रस” है।
  • पृथ्वी का गुण “गन्ध” है।
  • समस्त सृष्टि “पंचभूतों” से ही निर्मित है।
  • मनुष्य शरीर में स्थूल, सूक्ष्म, कारण “तीन“शरीर हैं।
  • स्थूल शरीर “अन्नमय” कोष कहलाता है।
  • सूक्ष्म शरीर में मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय तीन कोष होते हैं।
  • कारण शरीर “आनन्दमय” कोष कहलाता है।
  • कारण शरीर “अज्ञान” निर्मित होता है।
  • इसे “कारण” शरीर इसलिए कहते हैं कि मृत्यु होने पर “जीव” अर्थात् सूक्ष्म शरीर के साथ ही यह शरीर भी दूसरे स्थूल शरीर में चला जाता है।
  • तत्वज्ञान से जब सूक्ष्म शरीर के साथ कारण देह भी नष्ट हो जाता है, तब “जीव” पुनर्जन्म के बन्धन से “छूट” जाता है।
  • पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं, इच्छा शक्ति का नाम ‘इन्द्रिय’ है। जिनसे कार्य किया जाय वे “करण” हैं।

सच्ची बातें                                                                                                                           6

  • हाथ, पैर, वाक्, गुदा, उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय) – ये करण हैं।
  • नेत्र, कान, जिह्वा, नासिका, त्वचा ये भी ‘करण हैं।
  • नित्य-अनित्य, जड़-चेतन अथवा ‘मैं’ और ‘यह’ को प्रथकप्रथक समझना “विवेक” है।
  • आये-जाये अथवा इन्द्रियों से जो कुछ भी जाना जाय, वह सब “माया” है।
  • भ्रमित बुद्धि अर्थात् अज्ञान का नाम “मोह” है।
  • बुद्धि अर्थात् अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित चेतना का नाम “जीवात्मा” (जीव) है।
  • मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का नाम “अन्तःकरण” है।
  • अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों अर्थात् सर्वत्र सम्पूर्ण सृष्टि में विद्यमान अखण्ड, अविनाशी चेतन सत्ता का नाम “ब्रह्म” है।
  • यही चेतन सत्ता माया की उपाधि से अन्तर्यामी “ईश्वर” कही जाती है। अविद्या की उपाधि से जीव
  •  माया उपहित चेतन ईश्वर ही “अवतार” ग्रहण करता है, ब्रह्म अथवा परमात्मा नहीं।
  • सभी स्थूल शरीर ‘पचंभूतों के समूह (संघात) मात्र हैं।
  • ध्यान रहे संघात-संघात के लिए नहीं होता, अन्य के लिए होता है।
  • जो अपने “मैं” को सब जगह, सब समय, सभी वस्तुओं में अखण्ड तथा परिपूर्ण जानता है, वही “ज्ञानी” है। –
  • जो अपने को देह, जाति, कुल, वर्णाश्रमी तथा आने-जाने वाला व्यक्ति मानता है, वही “अज्ञानी” है।
  • जो अपने को शरीर रूपी घर अथवा जेल में रहने वाला जीव मानता है, वह “बुद्धिमान” है।

सच्ची बातें                                                                                                                           7

  • जो वस्तु जैसी है, उसे वैसा ही समझना “ज्ञान” है।
  • जो वस्तु जैसी है, उसके विपरीत जानना “अज्ञान” है।
  •  जिसे अपना ज्ञान हो, अन्य का भी ज्ञान हो, उसे “चेतन” कहते हैं।
  • जिसे न अपना ज्ञान हो, न दूसरे का ज्ञान हो, उसे “जड़” कहते हैं।
  • एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जीव का आना-जाना होता है, आत्मा का नहीं
  • आत्मा तो सर्वत्र आकाश अथवा सामान्य अग्नि की तरह अखण्ड और पूर्ण है।आकाश पुलाई का नाम है, नीलिमा का नहीं।
  • ब्रह्म, परमात्मा, परमेश्वर, विष्णु, शिव, कृष्ण, राम, नारायण तथा हरिः आदि सभी सम्बोधन “आत्मा” के ही हैं।
  • विश्व में जितनी भी भेद भ्रान्ति है, वह सब “उपाधियों” तथा अध्यारोप से है, वस्तुतः कोई भेद नहीं है।
  • जीव व ईश्वर का परमात्मा से भेद उपाधि से है, तात्विक नहीं है।
  • शरीर में प्राण शक्ति एक ही है, वही पाँच जगह विभाजित हो जाने पर पंचप्राण कहलाती है।
  • मरण स्थूल शरीर का होता है, “जीवात्मा” अथवा “आत्मा” का नहीं।
  • तीनों शरीरों, समस्त दृश्य तथा मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदि से चेतन आत्मा सूक्ष्मातिसूक्ष्म श्रेष्ठ-महान तथा “असंग” है।
  • गीता अध्यात्म विद्या को कहते हैं, पुस्तक को नहीं।
  • ज्ञान राशि का नाम वेद है, किसी पोथी का नहीं।
  • अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या को ही वेदान्त कहते हैं।
  • आत्मतत्व को जानने की इच्छा का नाम “जिज्ञासा” है।
  • अनित्य विषय भोगों, पद, प्रतिष्ठा तथा शरीर आदि में हेय बुद्धि का नाम “वैराग्य” है।

सच्ची बातें                                                                                                      8

करने की इच्छा का नाम

  • शरीर में जो ‘हम (मैं) बुद्धि है, उसका त्याग ही सच्चा “त्याग” है।
  • पुनर्जन्म के बन्धन से जीव की छूटने की इच्छा का नाम “मुमुक्षा” है।
  • सकाम कर्मों को न करना “त्याग” के अन्तर्गत ही है।
  • फल की इच्छा न रख कर कर्म करने का नाम भी “त्याग” है।
  • मन, इन्द्रियों को संयमित रखने का नाम “तप” है।
  •  स्वधर्म और सामान्य धर्मों का पालन करना “धर्म” है।
  • इसके विपरीत आचरण करना “अधर्म” है।
  • वर्ण, आश्रम तथा सामाजिक मर्यादा में न रहना, “पशुता” है।
  • तत्ववेत्ता से अध्यात्म विद्या पढ़ा हुआ व्यक्ति ही “शिक्षित” है।
  • विवेक पूर्वक वैराग्य भावना को दृढ़ करके अपने सत् स्वरूप को जानना जीव का परम धर्म है।
  • तत्वमसि आदि महावाक्यों के द्वारा ‘जीव-ब्रह्म’ की एकता का . ज्ञान कराने वाला व्यक्ति ही “सद्गुरु” है।
  • किसी के प्रति विशेष लगाव का नाम “राग” है।
  • किसी के प्रति विशेष घृणा का नाम “द्वेष” है।
  • अच्छाइयों को बुराई के रूप में बदलकर कहना “निन्दा” है। सच बात बता देना निन्दा नहीं है।
  • अपने स्वतः सिद्ध सच्चिदानन्दघन स्वरूप को न जानना “महा अज्ञान” है।
  • भक्ति की पराकाष्ठा का नाम “ज्ञान” है।
  • ज्ञान की पराकाष्ठा का नाम “भक्ति” है।
  • जीव का अपने वास्तविक सच्चिदानन्दघन स्वरूप में अटल होना ही “परम योग” है।

सच्ची बातें                                                                                                      9

  • केवल एक (अद्वितीय) परब्रह्म परमेश्वर का स्मरण, चिन्तन, ध्यान, ॐ (प्रणव) का जप आदि सदैव सहज भाव से करना ही “अव्यभिचारिणी भक्ति” है।
  • संसारी वस्तुओं, व्यक्तियों, विषयों के संकल्प-विकल्प तथा स्मरण में दौड़ने वाली वृत्ति का नाम “मन” है।
  • निर्णय और दृढ़ निश्चय तथा स्मृति करने वाली अन्तःकरण की वृत्ति का नाम बुद्धि है।
  • सत्पुरुष के सान्निध्य में रहकर परमात्मतत्व की चर्चा का श्रवण, विचार, तथा मनन आदि ही “सच्चा सत्संग” है।
  • भक्ति भी एक व्यसन है, असली भक्त और पागल में कोई विशेष अन्तर नहीं होता।
  • जो चर्चा विवेक जागृत कराकर, देहाभिमान तथा कर्ता-भोक्तापने की भाँन्ति को मिटा कर ब्रह्मभाव में स्थित करा दे, वही सच्ची भागवत कथा है, यही सत्संग का वास्तविक स्वरूप है।
  • भगवान् तथा ईश्वर का मुख्य नाम “ओऽम्” है।
  • मन, इन्द्रियों के आधीन रहना “पराधीनता” है।
  • जो असार है, परिवर्तनशील है, उसी का नाम “संसार” है।
  • शरीर और जगत् दो चीजें नहीं है, शरीर भी “जगत्” का ही रूप है।
  • जिस माया शक्ति ने जीवात्मा को अनात्मा (दृश्य) की ओर खींच रक्खा है, उसी का नाम “व्यवहार” है।
  • जिस माया ने जीव को जगत् में अच्छी तरह बाँध रक्खा है, उसी का नाम “सम्बन्ध” है।
  • ईश्वर, जीव, जगत, माया तथा ब्रह्म का जिस शास्त्र में विचार पूर्वक निर्णय किया गया हो, उस शास्त्र का नाम “वेदान्त” है।

सच्ची बातें                                                                                                    10

  • देहाभिमानी तथा कामनाओं से ग्रस्त विषयी मनुष्य का संगती “कुसंग” है।
  • पापों का नाश केवल “नाम-जप व संकीर्तन” से ही होता है।
  • यदि कोई धर्म का आचरण नहीं करता है, तो नाम-जप व संकीर्तन से भी पाप नष्ट नहीं होते हैं। जैसे परहेज न करने से औषधि लाभदायक नहीं होती है।
  • जो दिखाकर जप’ किया जाता है, वह ‘दम्भ’ के अन्तर्गत है।
  • देह, मन, बुद्धि आदि अनात्म पदार्थों तथा उपाधियों में ‘हम’ बुद्धि का नाम “अहंकार” है।
  • धन-सम्पत्ति, वैभव तथा पद, प्रतिष्ठा आदि के मिलने से जो एक विशेष प्रकार का अभिमान आ जाता है, उसी का नाम “मद” है। इसका नशा मदिरा के नशे से भी अधिक गहरा होता है।
  • लौकिक-पारलौकिक सुखों की इच्छा (चाहना), तथा विषयों को भोगने की लालसा का नाम “काम” है।
  • अपने वास्तविक ‘सत् स्वरूप’ में निष्ठा ही “मुक्ति” है।
  • ज्ञान की पराकाष्ठा को “निष्ठा” कहते हैं। ज्ञानी की दृष्टि में देश, काल, वस्तु तीनों की प्रतीति “बाधितानुवृत्ति” से होती है।
  • देह, जाति, लिंग आदि के भावों में रहना पुनर्जन्म का “बन्धन” है।
  • जो विधि-निषेध का वर्णन करे तथा परम सत्य वस्तु का प्रतिपादन करे, वही “शास्त्र” है।
  • विशेष रूप से विधि-निषेध का नियम “साधक” के लिए है।
  • मन-इन्द्रियों को संयमित रखकर निरन्तर “साधना” में रत रहने वाला “श्रद्धावान” साधक ही ज्ञान-भक्ति की साधना में सफल होता है।
  • किसी के गुणों में दोष बुद्धि हो जाना सबसे बड़ा “दोष” है।

Part-2 m iske aage ka

I am make website

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *