Apne Aap Ko Jano part-3

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Apne Aap Ko Jano part-3

Apne Aap Ko Jano part-3 भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दुष्टे परावरे ॥

Apne Aap Ko Jano part-3

                                                             मुण्डकोपनिषद् (२.२.८)

         हृदय ग्रन्थि खुलने पर अविद्याजन्य सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और उसी के साथ सभी कर्म-बन्धन भी क्षीण हो जाते हैं। ऐसे ज्ञानी को परम तत्त्व के दर्शन होते हैं।

       जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति तीन अवस्थायें जीव की हैं। जीव दिन-रात इन्हीं अवस्थाओं में विचरण करता रहता है। आत्मा एक ऐसी शुद्ध चेतना है जो जीव की इन अवस्थाओं का तटस्थ द्रष्टा रहकर सदा एक समान विद्यमान रहता है। वह सोता-जागता नहीं है। जैसे सूर्य के सामने पृथ्वी घूमती रहती है और उसमें दिन व रात होते रहते हैं, किन्तु पृथ्वी का प्रकाशक सूर्य सदा एक समान विद्यमान रहता है, वैसे ही आत्मचेतना से प्रकाशित होता हुआ जीव जाग्रत आदि अवस्थाओं में भ्रमण किया करता है। यह जीव आत्मा का प्रतिबिम्ब अर्थात् चिदाभास मात्र है।

          हम यह भी कह सकते हैं कि अनन्त आत्मा पाँच कोशों से परिच्छिन्न हुआ सा पूर्णरूप से अनुभव में नहीं आता। पाँच कोश – अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय हैं। ये पाँचो कोश जड़, विकारी, नश्वर और पराश्रित हैं। आत्मा इन से

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विलक्षण नित्य, चेतनघन, आनन्दस्वरूप और स्वतन्त्र है। मुंज के

आवरण हटाने पर जैसे उनके अन्दर छिपी सींक मिल जाती है, बोटी अन्नमय आदि कोशों का निषेध करने पर अपने आत्मा की उपलब्धि होती है।

       द्रष्टा-दृश्य का विवेक करें तो भी हमें आत्मस्वरूप मिल सकता है। समस्त जगत् के विषय दृश्य हैं और इन्द्रियां उनकी द्रष्टा हैं। इन्द्रियाँ भी मन से जानी जाती हैं, इसलिए इन्द्रियों का द्रष्टा मन है। मन में नाना प्रकार की वृत्तियाँ आती-जाती हैं। उनसे पृथक उनका भी एक द्रष्टा है। यह अन्तिम द्रष्टा आत्मा है। आत्मा का द्रष्टा कोई अनुभव में नहीं आता। इसलिए यह सर्वद्रष्टा स्वभाव से निर्विकार, वृत्तिहीन चैतन्य है। यही हमारा स्वरूप और सत्ता है।

       हम किसी भी प्रकार से विवेक या विचार करें, अन्त में अपने आत्मस्वरूप पर पहुँचते हैं। इसका अपरोक्ष अनुभव होने पर मायाजन्य द्वैत तिरोहित हो जाता है। एक अखण्ड आत्मतत्त्व ही सर्वत्र अनुभव में आता है। इस स्थिति का वर्णन करते हुये ईशावास्य उपनिषद् कहता है –

यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥

                                                       ईशावास्य उपनिषद् (७) 17

     जहाँ समस्त प्राणी आत्मस्वरूप ही हो जाते हैं और सर्वत्र एक तत्त्व दिखाई देता है, वहाँ कैसा मोह और कैसा शोक? इसी स्थिति का वर्णन करते हुए भगवान् गीता में कहते हैं –

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।

येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ भगवद्गीता (४. ३५)

           जिसको जानकर फिर तुम इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे, वरन् सम्पूर्ण भूतों को नि:शेष भाव से पहले अपने आत्मस्वरूप में और फिर मुझ सच्चिदानन्द घन परमात्मा में देखोगे। भगवान फिर कहते हैं –

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥ भगवद्गीता (६.२९)         

        योगयुक्तात्मा पुरुष सर्वत्र समत्व का दर्शन करते हुये आत्मा को सब भूतों में स्थित और सब भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है। और फिर

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ भगवद्गीता (६. ३०)

जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में मुझे देखता है ओर सम्पूर्ण भूतों को

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सो अन्तर्गत देखता है उसके लिए मैं अदृश्य नहीं हूँ और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं है।

        कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मज्ञान की स्थिति में परमात्मा भी प्राप्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण जीव और जगत् उसी तत्त्व में एक हए अनुभव में आते हैं। अब जानने के लिए कुछ शेष नहीं रहता। न देखा हुआ, देखा हुआ हो जाता है ओर न सुना हुआ भी सुना हुआ हो जाता है।

        ऐसे ज्ञानी पुरुष को शरीर, मन और बुद्धि हाथ में पकड़ी हुई कलम की भाँति अपने उपकरण प्रतीत होते हैं। उनके ऊपर उसका पूरा नियन्त्रण रहता है। व्यवहार काल में उसका व्यक्तित्व समन्वित (integrated) होता है। आत्मज्ञान के बिना मनुष्य का व्यक्तित्व सिर के बिना धड़ के समान है। वह एक कबन्ध मात्र है। ऐसे अधूरे व्यक्तित्व में जीवन जीने वाला मनुष्य बहुत भाग-दौड़ करने पर भी भटकता ही रहता है। उसके हाथ कुछ नहीं लगता।

          आत्मज्ञानी का व्यक्तित्व पूरा है। वह अपनी आत्मशक्ति से बुद्धि पर नियन्त्रण रखता है, बुद्धि से मन पर, मन से इन्द्रियों पर और इन्द्रियों से शरीर पर नियन्त्रण रखता है। ऊपर से नीचे तक ऐसा नियन्त्रित व्यक्तित्व सशक्त और कुशल होता है। अपने को ऐसा व्यवस्थित बनाना ही Personal Management है। इसलिए भगवान कहते हैं –

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इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धः परतस्तु सः॥ भगवद्गीता (३.२२

एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जाहं शत्रु महाबाहो कामरूप दुरासदम्॥ भगवद्गीता (३.४३१

अर्थात् इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानि श्रेष्ठ बलवान् और सूक्ष्म कहते हैं । इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है। इस प्रकार बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके कामरूप दुर्जय शत्रु को जीता जा सकता है।

अव्यवस्थित व्यक्तित्व पर काम का आधिपत्य रहता है। उसकी पराधीनता में मनुष्य नाना प्रकार के पापकर्म करता है और दुखी रहता है। कामनाओं की जंजीर टूटने पर वह मुक्त होकर आत्मा का अनन्त आनन्द अनुभव करता है। इस अवस्था में वह तृप्त और सन्तुष्ट होता है। उसी का वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं –

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।

आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

भगवद्गीता (३.१७)

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       जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा आत्मा में ही तृप्त और सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।

उसके सन्तुष्ट होने का तात्पर्य यह है कि अब उसे निष्कामता का जो आनन्द प्राप्त है, उससे बड़ी कोई अन्य उपलब्धि उसे नहीं दिखाई देती। इसलिए भगवान् कहते हैं –

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।

यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥

भगवद्गीता (६. २२)

अपने परमात्मस्वरूप लाभ को प्राप्त होकर साधक उससे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं मानता। उस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता। वह सदा ही आनन्द मग्न रहता है।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ भगवद्गीता (६.२८)

वह परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर अनन्त आनन्द का अनुभव करता है। उसका वह आनन्द अक्षय होता है।

स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ भगवद्गीता (५. २१)

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वह ब्रह्मात्मैक्य भाव को प्राप्त होकर अक्षय आनन्द का अनुभव करता है।

इस प्रकार जो अपने को पूर्णरूप से जानता है, वह इसी जीवन में पूर्णता प्राप्त कर निरापद आनन्दमय जीवन जीने लगता है। उसे मृत्यु भय भी नहीं रह जाता। शरीर छोड़ने के बाद वह फिर कोई शरीर धारण कर दुःखों में नहीं पड़ता।

भगवान श्री कृष्ण ऐसे आत्मज्ञानी के लिए कहते हैं –

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।

नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥

भगवद्गीता (८.१५)

ऐसे परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दु:खों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते।

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ भगवद्गीता (८.१६)

ब्रह्मलोक पर्यन्त सभी लोक पुनरावर्ती हैं। उन्हें प्राप्त होकर भी पुन: संसार में आना पड़ता है। परन्तु मुझ (परमात्मा) को प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता।

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न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ भगवद्गीता (१५.६)

जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते, उस चेतना के प्रकाश से स्वयं प्रदीप्त परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही। वही मेरा परम धाम है।

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