Apne Aap ko jano part-2

Apne Aap ko jano part-2
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Apne Aap ko jano – part-2

Apne Aap ko jano – part-2… ऊर्ध्वगति, रजोगुणी जीवों को मध्यम और तमोगुणी जीवों को अधोगति प्राप्त होती है।

          तमोगुणी व्यक्ति तो अपनी जड़ता के कारण अपना हितअनहित समझ नहीं सकता, किन्तु रजोगुणी व्यक्ति अपनी दुर्बलता समझ कर उसे दूर कर सकता है। उसे समझना चाहिए कि रजोगुण उसी के भीतर बैठा शत्रु है। वह मन में कामना उत्पन्न कर मनुष्य को विषय भोगों में लगाये रहता है। इसे नष्ट करने के लिए अनेक उपाय शास्त्रों में बताये गये हैं। इन्द्रिय-निग्रह रूप तप सब से प्रथम साधन है। गीता में भगवान् कहते हैं –

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।

पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥ भगवद्गीता (३. ४१)

         इसलिए पहले इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान-विज्ञान को नाश करने वाले पापी रजोगुण और काम को अवश्य ही नष्ट कर देना चाहिए।

       इसके अतिरिक्त निष्काम कर्मयोग का अभ्यास भी रजोगुण को दूर कर चित्त को शुद्ध करता है। भगवान् कहते हैं-  

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ भगवद्गीता (३.१९)

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       इसलिए निरन्तर आसक्तिरहित होकर सदा कर्त्तव्य कर्म करते रहो क्योंकि अनासक्त भाव से कर्म करने वाला मनुष्य परमात्मा को प्राप्त होता है।

       भगवान् के भजन से भी रजोगुण ओर पाप क्षीण होते हैं। इसलिए भगवान् कहते हैं –

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥भगवद्गीता(९. ३०)

       यदि कोई अति दुराचारी अनन्य भाव से मेरा स्मरण करता है तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।

           इस प्रकार इन्द्रिय-निग्रह, कर्मयोग और ईश्वर स्मरण से सत्वगुण की वृद्धि होती है और मन को मलिन करने वाले रजस और तमस नष्ट हो जाते हैं। एक शब्द में ऐसे व्यक्ति को कह सकते हैं विरक्त। विरक्त पुरुष आत्मज्ञान और परमात्मज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होता है। हमारी आसक्तियाँ ही अश्वत्थ वृक्ष की भाँति गहरी जड़ जमाये बैठी हैं। उनको अनासक्ति रूपी कुल्हाड़ी से काट कर अपने आत्मस्वरुप की खोज करनी चाहिए। भगवान् कहते हैं –

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलम्

असंगशस्रेण दृढेन छित्त्वा। भगवद्गीता (१५. ३)                        8

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं

यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। भगवद्गीता (१५.४)

            वासनारूपी गहरी जड़ वाले पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्यरूपी शस्त्र द्वारा काट कर उस परम पद रूप परमात्मा को भली भाँति खोजना चाहिए जिसको प्राप्त हुए पुरुष लौटकर संसार-चक्र में नहीं पड़ते।

         आत्मतत्त्व की प्राप्ति यत्न करने वाले को ही होती है, किन्तु यत्न करने वाला पुरुष रजोगुण और तमोगुण के विकारों से मुक्त होना चाहिए। भगवान् कहते हैं –

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्चन्त्यात्मन्यवस्थितम्।         यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥ भगवद्गीता (१५.११)

          यत्न करने वाले योगीजन अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते हैं किन्तु अशुद्ध अन्त:करण वाले अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।

        आत्मा आकाश की तरह व्यापक और सर्वगत है, किन्तु खोजने वाले को वह सर्वत्र नहीं मिलता। सर्वप्रथम उसे अपने हृदय में खोजना चाहिए। वहाँ हम शुद्ध चित्त से आत्मा को सहज ही पा सकते हैं। “सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो” – भगवान् कहते हैं, मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी                   9

रूप से स्थित हूँ। फिर कहते हैं – “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति” – हे अर्जुन! ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय-देश में स्थित है। गोस्वामी जी मानस में कहते हैं – “व्यापक एक ब्रह्म अविनाशी। सत चेतन घन आनंद रासी। अस प्रभु हृदय अछत अविकारी।” ऐसा सच्चिदानन्द स्वरुप परमात्मा निर्विकार रहते हुए हृदय में वास करता है। इस प्रकार समस्त शास्त्रों में प्रसिद्ध है कि आत्मा, परमात्मा या सत् सब के हृदय में विशेष रूप से उपलब्ध है। उसे वहीं खोजना चाहिए।

        हृदय के सम्बन्ध में भी बड़ा विभ्रम है। प्रायः शरीर में वक्ष के मध्य भाग में लोग हृदय की कल्पना करते हैं। यह शास्त्र विरुद्ध है। जिस हृदय में आत्मा की खोज की जाती है वह स्थूल शरीर में नहीं है। अपने सूक्ष्म शरीर को पहचानें। उसमें अन्त:करण है। यहाँ नाना प्रकार की वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। उसमें प्रेम, दया, क्षमा, करुणा आदि कि सात्विक वृत्तियाँ जहाँ उत्पन्न होती हैं, वहीं हृदय है। प्रसिद्ध है कि हम सब हृदय से प्रेम करते हैं। ध्यान दें, प्रेम की वृत्ति या दया की वृत्ति कहाँ उत्पन्न होती है। उसे पहचानें, वही हृदय है। इस विषय में छान्दोग्य उपनिषद् की श्रुति कहती है – “स वा एष आत्मा हृदि, तस्य एतदेव निरुक्तिं, हृद्यमिति, तस्मात् हृदयम् अहरहर्वा, एवं वित्स्वर्ग लोकमेति” अर्थात् आत्मा हृदय में है। ‘हृदि अयम्’ –

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यह हृदय में है, यही इसकी निरुक्ति या व्युत्पत्ति है। इसी से यह हृदय है। इस प्रकार जानने वाला पुरुष स्वर्गलोक को जाता है। इस श्रति वचन में हृदय शब्द की निरुक्ति से यह जानने में आता है कि आत्मा अपने हृदय में है। वहीं हमें उसे खोजना चाहिए।

हृदय में अपने आत्मस्वरूप को खोजने के लिए सद्गुरु और शास्त्र का सहारा लेना चाहिए। मुण्डक उपनिषद् के ऋषि कहते हैं –

परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो

निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्

समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ मुण्डक उपनिषद् (१.२.१२)

        कर्म से प्राप्त होने वाले लोकों की परीक्षा कर माया से विरक्त होकर और ऐसा निश्चय करके कि अकृत वस्तु कर्म से प्राप्त नहीं हो सकती, ब्राम्हण को उसे जानने के लिए हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रम्हनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए।

       इस श्लोक में आत्मज्ञान के लिए कुछ आवश्यक शर्तों का उल्लेख किया गया है। पहले मनुष्य कर्मसाध्य उपलब्धियों की परीक्षा करके देख ले कि उसे वस्तुत: जो कुछ चाहिए वह वहाँ मिलने वाला नहीं है। मनुष्य जिस शाश्वत सुख और मुक्ति की इच्छा रखता है वह कर्म से मिलने वाली नहीं है। कर्म नश्वर

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है और उससे नश्वर वस्तुएँ ही मिलती हैं। इसलिए उनके प्राप्त होने पर और भोग में उनके नष्ट हो जाने पर उन्हें प्राप्त करने के लिए पुन: कर्म करना पड़ता है। इसलिए कर्म और भोग का चक्र निरन्तर चलता रहता है। आत्मा का शाश्वत आनन्द कर्म से प्राप्त नहीं हो सकता। उसकी प्राप्ति ज्ञान से ही होगी। ऐसा समझ कर कर्म और भोग के माया जाल से विरक्त हो जाना चाहिए।

            विरक्त पुरुष भी आत्मज्ञान स्वतन्त्र विचार से प्राप्त नहीं कर सकता। उसे जानने के लिए जिज्ञासु पुरुष को गुरु के पास जाना चाहिए। गुरु के मुख से सुनकर ही आत्मज्ञान उत्पन्न होता है। गुरु में भी दो विशेषतायें होनी चाहिए। एक तो वह श्रोत्रिय हो, शास्त्र का ज्ञान रखता हो और दूसरे वह ब्रह्मनिष्ठ हो। वह स्वयं अपने गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर, उसमें स्थित हो गया हो। शिष्य को आत्मज्ञान प्रदान करने में इन दोनों गुणों की आवश्यकता होती है। इसलिए गीता में भगवान कृष्ण ने भी इन दोनों गुणों से युक्त गुरु के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करने की सम्मति दी है। वे कहते हैं –

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ भगवद्गीता (४ . ३४)

         उस ज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझो। उनको भली भाँति दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने

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से और कपट छोड़कर सफलतापूर्वक प्रश्न करने से वे शास्त्र के जाता और परमात्मा को भली भाँति जानने वाले महात्मा तुम्हें उस तत्त्वज्ञान का उपदेश देंगे।

        इस श्लोक का ज्ञानी और तत्त्वदर्शी, श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गरु ही है। उससे ज्ञान प्राप्त करने वाले शिष्य में भी कुछ गुण होने चाहिए। वह ‘निर्वेदमायात्‘ अर्थात् विरक्त तो होना ही चाहिए, इसके अतिरिक्त गुरु के पास विनम्र होकर ज्ञान ग्रहण करे। वह प्रणिपात और सेवा के द्वारा अपनी विनम्रता और सरलता (अहंकारशून्यता) व्यक्त करे। इन गुणों से प्रभावित होकर गुरु उसको आत्मज्ञान का उपदेश देंगें। अहंकारी और उद्दण्ड मनुष्यों को यह ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

           यद्यपि यह समस्त ज्ञान पुस्तकों में लिखा हुआ है किन्तु पुस्तकें पढ़कर किसी के हृदय में आजतक आत्मज्ञान उदित नहीं हुआ। कारण यह है कि पुस्तकों से परिप्रश्न नहीं किया जा सकता। यदि आपके मन में कोई प्रश्न आता है और उसका समाधान तत्काल नहीं मिलता तो आगे मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। गुरु के पास यह सुविधा है कि आप अपने प्रश्नों का समाधान तत्काल पा सकते हैं।

          इसके अतिरिक्त गुरु शिष्य को वहीं साधना मार्ग बताता है जो उसके लिए उपयुक्त है। शास्त्रों में तो सभी मार्गों का

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वर्णन है। साधक उनमें से अपने लिए उपयुक्त मार्ग नहीं खोज सकता। इसलिए आत्मज्ञान के लिए गुरु के पास जाना ही उचित है।

        आत्मज्ञान की साधना के तीन अंग हैं – श्रवण, मनन और निदिध्यासन। महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं – “आत्मा वा अरे श्रोतव्यः मन्तव्यो निदिध्यासतव्यः” । गुरु मुख से पहले आत्मतत्त्व का श्रवण करे, फिर शान्त एकान्त स्थान में बैठकर उसका मनन करे। पूर्व मिथ्या धारणाओं को हृदय से निकाल कर सत्य की स्थापना करे। उसे ही अपना मत बनावे। उसी का निरन्तर चिन्तन करना निदिध्यासन है। ध्यान से निदिध्यासन इस माने में भिन्न है कि ध्यान तो अचल आसन पर बैठकर कुछ देर करते हैं, किन्तु निदिध्यासन का अभ्यास उठते-बैठते, चलते-फिरते निरन्तर किया जाता है।

       श्रवण भी एक विशेष कला है। सुनने के साथ उसके अर्थ को समझकर प्रतिपाद्य वस्तु को अपने अन्दर पहचानने का प्रयास किया जाता है। गुरु जिस आत्मतत्त्व का प्रतिपादन करता है, वह हमारे हृदय में पहले ही विद्यमान है, केवल उसे पहचानना है। अपना आत्मस्वरूप हमें बिल्कुल अज्ञात नहीं होता। हम किसीन-किसी रूप में अपने को जानते भी हैं। जो कुछ हम अपने बारे में जानते हैं, उसी की छानबीन कर हम धीरे-धीरे अपने सत्स्वरूप को जान सकते हैं।                         14

          हमें अपने स्वरूप का ज्ञान कराने वाले तीन ग्रन्थ हैं – उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता। इन्हें प्रस्थानत्रय कहते हैं। इन ग्रन्थों पर भगवान शंकराचार्य के भाष्य भी हैं और उन्होंने इस विषय पर कई स्वतन्त्र ग्रन्थ भी लिखे हैं। उनमें से तत्त्वबोध, आत्मबोध, अपरोक्षानुभूति और विवेकचूड़ामणि अधिक प्रसिद्ध हैं।

         इन ग्रन्थों में आत्मज्ञान कराने वाली विवेक की अनेक प्रक्रियायें हैं। अवस्थात्रय विवेक, पंचकोश विवेक, द्रष्टादृश्य विवेक, पंचभूत विवेक आदि से विचार करने पर हम अपने सत्स्वरूप तक पहुँच सकते हैं। हमारे व्यक्तित्व में आत्मा और अनात्मा दोनों का मिलाजुला रूप अनुभव में आता है। आत्मा चेतन है और अनात्मा जड़ है, किन्तु दोनों के धर्म एक-दूसरे पर आरोपित होकर गाँठ सी पड़ गयी है। गोस्वामी जी के शब्दों में “जड़ चेतनहिं ग्रन्थि परि गई; जदपि मृषा छूटत कठिनई” – इसके फलस्वरूप हम अपने आत्मस्वरूप को भूलकर अनात्मा को ही आत्मा मान बैठे हैं। यही अविद्या है। इस कारण हम अमर होकर भी अपने को मरणधर्मा मान रहे हैं, आनन्दमय होते हुये भी दुखी समझ रहे हैं और मुक्त होने पर भी बद्ध समझ रहे हैं। आत्मा-अनात्मा के विवेक से अविद्या नष्ट होने पर ये भ्रान्ति मूलक समस्यायें नष्ट हो जाती हैं। श्रुति कहती है –                                                                                       15

I am Anmol gupta, i warmly welcome you to APNE KO JANO, and hope you liked this article, My mission is to inspire millions of people, i can show you the right path to go ahead.

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