Apne aap ko jano अपने आप को जानो

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Apne aap ko jano

Apne aap ko janoअपने आप को जानो सम्पूर्ण जगत् के कण-कण को जान कर भी यदि अपने आप को नहीं जाना, तो कुछ नहीं जाना और यदि अपने आप को जान लिया तो सब कुछ जान लिया।

Apne aap ko jano अपने आप को जानो

                                        ॥ वि ॥

                                          वि वि ध ग्रन्थ मा ला

                     

  अपने आप को जानो

                            

   स्वामी शंकरानन्द

                    

   सेन्ट्रल चिन्मय मिशन ट्रस्ट

अपने आप को जानो

सम्पूर्ण जगत् के कण-कण को जान कर भी यदि अपने आप को नहीं जाना, तो कुछ नहीं जाना और यदि अपने आप को जान लिया तो सब कुछ जान लिया। जीवन के महान् वैज्ञानिक प्राचीन ऋषियों ने घोषणा की है कि अपने सत् स्वरूप को जान लेने पर न देखा हुआ भी देखा हुआ हो जाता है, न सुना हुआ भी सुना हुआ हो जाता है और न जाना हुआ भी जाना हुआ हो जाता है। छान्दोग्य उपनिषद् की इसी युक्ति को दोहराते हुये गीता में भगवान् कहते हैं –

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।।

यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ भगवद्गीता (७.२)

          मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित तत्वज्ञान को सम्पूर्णता से कहूँगा जिसको जानकर जगत् में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता।

       यह युक्ति अतिशयोक्ति मात्र नहीं है वरन् पूर्णतः सत्य है। इस सत्य का अनुभव हर काल में हजारों-लाखों लोगों ने

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किया है। आज भी हम सब उसे अपने व्यक्तिगत अनम जान सकते हैं। आत्मज्ञान इतना महत्वपूर्ण होते हए भी लोग उसे पाने का प्रयास नहीं करते। अधिकांश लोग टा महत्व भी नहीं जानते और सारा जीवन भौतिक विद्यायें ही तथा उनके द्वारा भौतिक समृद्धि अर्जित करने. संगीत करने और भोगने में ही व्यय कर देते हैं। यह दुर्भाग्य की बात है।

       वस्तुत: विद्यायें दो प्रकार की हैं। एक तो भौतिक विद्या है जो सारे संसार के स्कूल और कॉलेजों में पढाई जाती है। उसका सम्बन्ध बाह्य जगत् के विविध पक्षों से है। दसरी अध्यात्म विद्या कहलाती है। इसका सम्बंध हम सबके अपने आप से है। जब हम अपने आपको जानना चाहते हैं तो अध्यात्म विद्या सीखते हैं। इस विद्या के जानने वाले और दूसरों को सिखाने वाले भी हैं। किन्तु इसको सीखने वालों की कमी के कारण इसके सिखाने की व्यवस्था हर नगर और गाँव में नहीं है।

         ऊपरी दृष्टि से लगता है कि हम अपने आपको जानते ही हैं। नयी बात जानने को क्या है? किन्तु अध्यात्म विद्या के द्वारा जब हम अपने आन्तरिक स्वरूप को जानने का प्रयास करते है तो ज्ञात होता है कि हम अपने बारे में बहुत थोड़ा जानते थे और

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जो कुछ जानते थे वह भी भ्रान्ति थी। भ्रान्ति मिथ्या ज्ञान है। उसके कारण हम सब लोग अपने को शरीर मात्र मानते हैं। एक भौतिकवादी चार्वाक् के अतिरिक्त कोई भी भारतीय दार्शनिक शरीर को अपना स्वरूप और सत्ता नहीं मानता।

           दार्शनिकों का कई बातों पर मतभेद है, किन्तु वे सब पुनर्जन्म और कर्मसिद्धान्त को एक समान स्वीकार करते हैं। ऐसी स्थिति में एक स्थूल शरीर जो हम अपनी आँखों से देखते हैं, मरने पर पंचभूतों में मिल जाता है। यह शरीर दूसरा जन्म धारण नहीं कर सकता। फिर दूसरा जन्म लेकर शरीर धारण करने वाला इसके भीतर कौन है? दार्शनिकों ने उसे जीव नाम दिया है।

          जीव एक सूक्ष्म तत्व है। इसे सूक्ष्म शरीर भी कहते हैं। इसके सत्रह अंग हैं। ये सत्रह अंग पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और दो मन-बुद्धि हैं। यदि हम स्थूल शरीर से ऊपर उठकर इन सत्रह अंगों को पहचानें तो अपने जीव रुप को जान सकते हैं। जाग्रत अवस्था में यह जीव स्थूल शरीर के द्वारा बाह्य जगत् से सम्पर्क करता है। स्वप्नावस्था में स्थूल शरीर से इसका सम्बन्ध छूट जाता है। उस समय यह अपनी वासनाओं के अनुसार कल्पित सृष्टि देखता है। वही उसका स्वप्न है।

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            जीव अपने अहंकार में कर्ता-भोक्ता भाव रखकर जो कर्म करता है वे शुभ और अशुभ होते हैं। वे परिपक्व हो पाप-पुण्य बनते हैं और जीव को सुख-दुःख देते हैं। जीव जैसे कर्म करता है, वैसी ही उसकी वासनाएँ बनती हैं और वासनाओं के अनुसार ही वह सुख-दु:ख भोगता है और उसी प्रकार के कर्म पुन: करता है। कामना, कर्म और फलभोग का एक निरन्तर चलने वाला चक्र है, जिसे संसार कहते हैं। इस चक्र में पड़ा जीव ही संसार-बंधन में पड़ा है। जीव एक शरीर छोड़कर दूसरा शरीर धारण करता हुआ आगे बढ़ता रहता है। किन्तु उसके संसार चक्र का अन्त नहीं होता।

            जीव को यत्किंचित विषयों का सुख प्राप्त होता है। किन्तु उसके साथ उसे कई गुना दु:ख भोगना पड़ता है। जरा, मृत्यु और जन्म भी दुःख देने वाली अवस्थाएं हैं। ऐसी चेतना उत्पन्न होने पर जीव-कर्मबंधन से छुटना चाहता है। इसी को शास्त्र और सन्त मुक्ति की संभावना प्रतिपादित करते हैं।

        जीव अहंकार त्यागकर आत्मभाव प्राप्त कर सकता है। आत्मा सच्चिदानन्द स्वरुप आकाश की भांति व्यापक तत्व है। वही अपना वास्तविक स्वरुप और सत्ता है। जीवभाव और दहभाव मिथ्या भ्रान्तियाँ हैं। इन प्रान्तियों में जीवन जीने वाले पुरुष कोट, भय, चिन्ता और द:ख से पीडित रहते हैं। वे अपनी भ्रान्ति के                                                                                       4

घेरे में कितने ही सुख-सुविधा के साधन जुटाते रहें और अपनी परिस्थितियों को कितना ही अनुकूल बनाने का प्रयास करते रहें किन्तु उन्हें शान्ति और विश्राम नहीं मिलता। ऊपरी दृष्टि से सुखी दिखाई देने वाले पुरुष भी अवसाद और दुःख से पीड़ित रहते हैं। इस समस्या से छूटने का उपाय भौतिक जीवन में नहीं है। यद्यपि समाज में बहुत से लोग स्वर्ग को बड़ी सुखदायी स्थिति मानते हैं किन्तु देव शरीर धारण कर वहाँ रहने वाले जीव भी इन्द्र और प्रजापति आदि से ईर्ष्या करते और दुःखी रहते हैं।

         आत्मज्ञानी मनुष्य अहंकार राग-द्वेष और कर्ता-भोक्ता भाव से छूट जाता है। उसका पुनर्जन्म भी नहीं होता। उसके ज्ञान में आत्मा और परमात्मा अभिन्न तत्व हैं।

         अपने आत्मस्वरुप का खोया हुआ राज्य पुन: प्राप्त करने के लिए मुख्य रूप से दो सीढ़ियाँ ऊपर की ओर चढ़नी होंगी। पहले वैराग्य के द्वारा चित्त-शुद्धि और फिर विद्या के द्वारा अविद्या का नाश कर नित्य मुक्ति प्राप्त करनी होगी।

        वैराग्य भाव लाने के लिए अपने तामसी और राजसी स्वभाव को त्यागकर सात्विक स्वभाव बनाना होगा। सत्त्व, रजस् और तमसमयी प्रकृति अलग-अलग अनुपातों में मिलकर हर व्यक्ति के चित्त में वास करती है। यह प्रकृति या वासना ही कारण शरीर कहलाती है। तीनों गुण हर व्यक्ति में रहते हैं,

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