वेद – वेदान्त तथा उपनिषदों का सार

वेद - वेदान्त तथा उपनिषदों का सार
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वेदान्त अर्थात् ‘ अध्यात्मविद्या ‘ का उद्घोष है , कि दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति तथा परमानन्द की प्राप्ति एक मात्र ” ब्रह्मविद्या के श्रवण , मनन , विचार तथा निदिध्यासन के अभ्यास से ही हो सकती है । जिसके लिए ” नित्यानित्य ” वस्तुके ” विवेक ‘ तथा अनित्य दृश्यवर्ग से तीव्र वैराग्य ” की अत्यन्त आवश्यकता है । उपनिषद् बोलते हैं , कि जगत् के प्रति सत्यत्व बुद्धि अथवा महत्त्व बुद्धि का कारण अज्ञान ” है । इस अज्ञान का निवारण एक मात्र ” ज्ञान ” से ही सम्भव है । तात्पर्य यह है कि जगत् अथवा संसार का कारण ” परमात्मा नहीं , ” अज्ञान ‘ है । जैसे शीप में चाँदी अथवा रस्सी में सर्प , स्वर्ण में कंगन दिखाई देने का कारण शीप नहीं . रस्सी नहीं , स्वर्ण नहीं , ” अज्ञान ” है । अज्ञान दूर होते ही जगत् या संसार नाम की कोई वस्तु नहीं रह जाती है । सब कुछ ब्रह्ममय हो जाता है । इस वाक्य का अभिप्राय यह है , कि सब कुछ है ही नहीं , अर्थात् नानात्व है ही नहीं । जो वस्तु भ्रम से दिखाई देती है , वास्तव में वह होती ही नहीं है। इसलिए नानात्व सत्य नहीं है । नानात्व जिस चेतन सत्ता ( अधिष्ठान ) के अस्तित्व पर भास रहा है । वह निर्विशेष , निराकार , अविनाशी ,अखण्ड सत्ता ही सत्य है । इस ” सत्ता से किसी का वास्तविक | ” मैं ” – ” हम ” प्रथक नहीं है ।

।। भ्रान्तः प्रतीतः संसारः ।।

वेदान्त कहता है –

सभी प्राणियों के अन्तःकरण आदि के सहित शरीर , यन्त्र की भाँति अचेतन ही हैं । इनमें चेतना का संचार ” मेरे ‘ ( आत्मा ) सान्निध्य – सम्पर्क मात्र से हुआ करता है । तीनों गुणों की विसमता , संस्कार तथा वासना आदि के कारण सभी यन्त्रों की क्रियाओं , समझ तथा बुद्धि आदि में भेद दिखाई देता है – जैसे विद्युत के यन्त्रों की क्रियाओं , फल , परिणाम आदि में अन्तर ( भेद ) दिखाई देता है । विद्युत में भेद नहीं है , विद्युत एक ही है । इसीप्रकार मेरी “ सत्ता ‘ में कोई भेद – भाव नहीं है । परमार्थ दुष्टि से ” मैं ” -आत्मा सम्पूर्ण दृश्य – प्रपंच का विर्वती अधिष्ठान हूँ । वेदान्त शास्त्र इसीलिए मुझे ” अद्वितीय ब्रह्म कहते हैं ।

इस विद्या के आचार्य कहते हैं , किसी छोटे से पात्र के आकार को नष्ट कर देने से अथवा आकार के नष्ट हो जाने पर ऐसा मालूम पड़ता है कि पात्र के अन्दर का आकाश , महाकाश से एक हो गया है । चलने पर ऐसा प्रतीत होता है , कि पात्र में बन्द आकाश को हम अपने साथ लेकर चल रहे हैं । परन्तु ये दोनों दृष्टियाँ भ्रान्ति युक्त हैं । क्योंकि पात्र में जो आकाश था उस आकाश की महाकाश से पहले से ही एकता थी । वह कभी महाकाश से प्रथक हुआ ही नहीं था । दूसरी बात आकाश की पात्र के साथ आने – जाने की जो झूठी कल्पना थी , वह भी निर्मूल थी । पूर्ण वस्तु का हिलना – डुलना सम्भव ही नहीं है । इसी दृष्टान्त के सिद्धान्त से देखने पर ज्ञात होता है , कि देहाकाश , शरीर के नष्ट हो जाने पर कहीं आता जाता नहीं है , क्योंकि ” देहाकाश ‘ तो एक काल्पनिक उपाधि थी , वह तो महाकाश से एक था ही । केवल उपाधि से भेद – भ्रान्ति उत्पन्न हो गई थी । इसी नियम के आधार पर श्रुतियाँ कहती हैं कि आत्मा आकाशवत् सूक्ष्मातिसूक्ष्म , व्यापक , परिपूर्ण तत्त्व है । शरीरों के नष्ट होने पर आत्मा का निकल जाना अथवा कहीं आना जाना सम्भव ही नहीं है । जो इस पूर्णता के नियम को नहीं समझते हैं । वे ही अनर्गल प्रलाप किया करते हैं । आत्मा और आकाश में अन्तर केवल इतना ही है , कि “आत्मतत्व ” संविद् ( चेतन ) सत्ता है । आकाश जड़ वस्तु है ।

इसप्रकार बारम्बार विचार करते रहने से ज्ञात होता है , कि शरीर की उत्पत्ति से हमने देह में प्रवेश नहीं किया है । देह के नष्ट हो जाने पर मुझे कहीं आना – जाना नहीं है । आना – जाना जिसका होता है , वह “ माया ‘ है । न मुझ आत्मा का जन्म हुआ है , न मृत्यु होगी । न मैंने कोई कार्य किया है , न करता हूँ , न भोक्ता । सम्पूर्ण चराचर सृष्टि मेरी सत्ता पर ही भास रही है अर्थात् मुझ आत्म तत्व के अस्तित्व पर ही सृष्टि भास रही है । जैसे – सुवर्ण की सत्ता पर आभूषण भासते अर्थात् प्रतीत होते हैं , जल की सत्ता पर बरफ व तरंगे आदि दिखाई देती हैं , होती नहीं हैं । माने न आभूषण होते हैं , न वर्फ , न तरंगें , भ्रान्ति ( अज्ञान ) से दिखाई देता है । इसी नियम व सिद्धान्त के आधार पर विचार करने पर ज्ञात होता है , कि ” यह ‘ की श्रेणी में जो कुछ चर्म चक्षुओं से जगज्जाल दिखाई दे रहा है , उसमें से किसी नाम – रूप का परमार्थ दृष्टि से किंचित मात्र अस्तित्व नहीं है । इसलिए वेदान्त इस दृश्य – प्रपंच को असत् कहता है । असत् उसी को कहते हैं, जिसका स्वयं का स्वतन्त्र अस्तित्व न हो । सत् उसे कहते हैं , जिसका कभी बाध न हो सके । हमारी सत्ता अर्थात् आत्मा की सत्ता तीनों कालों , तीनों अवस्थाओं में अबाधित रहती है । इसलिए श्रुति माता बार – बार समझाती है , कि ” तुम्हीं ” शाश्वत सत्य हो , अनुभव करके देख लो अर्थात् अवस्थात्रय का विवेक करके देख लो । जब ” मेरे ‘ अर्थात् “आत्मा “ के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं , तो ” मैं ” अपने को अद्वितीय भी नहीं कह सकता । सत् – असत् , कारण – कार्य , निर्गुण – सगुण , नित्य — अनित्य , दृष्टा – दृश्य , बन्ध – मोक्ष सुख – दुःख , शान्ति – अशान्ति , यह सभी एक दूसरे की अपेक्षा से जिज्ञासुओं को तत्व विचार कराने के लिए , वेदान्त में समझाये गये हैं । बोधवान को ज्ञात हो जाता है, कि ये द्वन्द्व मुझमें कहाँ हैं ? अर्थात् नहीं हैं ।

अचेतन मन , बुद्धि , चित्त तथा इन्द्रियाँ आदि ” मेरे ” सम्पर्क मात्र से सचेतन होकर अपनी – अपनी प्रकृति ( स्वभाव ) के अनुसार क्रियाशील रहते हैं । मुझ आत्मा में संस्कार और वासना का भी लेश नहीं है । देह आदि की शुद्धता – अशुद्धता तो मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकती । क्योंकि मैं असंग हूँ । असंगता भी कहने मात्र के लिए है , क्योंकि मुझसे कुछ प्रथक हो , तो असंग कहा जाय । फिर भी जिज्ञासुओं को ” आत्मतत्त्व ” का बोध कराने के लिए वेदान्त शास्त्र इसीप्रकार का उपदेश करते हैं । ” मुझ ” ( आत्मतत्व ) को शास्त्र नित्य , शुद्ध , बुद्ध , मुक्त बतलाते हैं । देश , काल , वस्तु की प्रतीति भी मुझ चेतन सत्ता के अस्तित्व पर ही मुझे ही होती है , देहादि को नहीं । यदि समस्त जीवों का ” मैं अर्थात् सर्वाधिष्ठान ” आत्मतत्त्व ‘ न हो , तो देश , काल , वस्तु को जानने वाला कौन होगा ? अर्थात् कोई नहीं और न देश , काल , वस्तु तथा ईश्वर ही होगा ।

वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है , कि वेदों का ईश्वर , जीव जगत् के विषय में अन्तिम निर्णय वेदान्त इन तीनों के अधिष्ठान का विचार करता है । निर्णय देता है , कि इन तीनों का जो अधिष्ठान है , वह ‘ आत्मा ‘ है । इसी स्वयंप्रकाश चेतन तत्त्व को महारामायण – योगवासिष्ठ , उपनिषद् , ब्रह्मसूत्र तथा गीता आदि में ब्रह्म , आत्मा , परमात्मा , हरिः तथा नारायण आदि अनेक नामों से सम्बोधित किया गया है । ” विद्यार्थी ” बनकर इस ” विद्या ‘ को पढ़ने से ज्ञात होता है , कि उपरोक्त कोई भी नाम ” मेरे ‘ नहीं हैं । ” मैं ” तो नाम – रूपों से रहित “ संविद् सत्ता ” मात्र हूँ । यही ” परमार्थ सत्ता ” प्रत्येक ” जीवात्मा ‘ का अपना ही सत् स्वरूप है अर्थात् असली स्वरूप है । नाम – रूप तो ” मायिक होते हैं ।

जीव ” संज्ञा भी काल्पनिक है , क्योंकि ” जीवात्मा ” की स्वतन्त्र सत्ता नहीं है । अविद्या से ग्रसित चेतना को ” जीव ” कहते हैं । यह चेतना – चेतन आत्मा का ही प्रतिबिम्ब है । मोह से आक्रान्त होने के कारण इस चिदाभास ने देहादि रूपी संघात से अथवा देह रूपी यन्त्र से लोहअग्निवत् तादात्म्य करके मिथ्या ” अहं का रूप धारण कर लिया है । यह अहंकार यद्यपि बिलकुल ही असत् है , फिर भी व्यवहार इसी मिथ्या अहंकार के आश्रित ही चला करता है । इस मिथ्या अहं वृत्ति में सत्यत्व बुद्धि हो जाने के कारण ” जीवात्मा चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है , भटकता रहता है । कभी किसी शरीर में इसे ” परम शान्ति ” का अनुभव नहीं होता है । क्योंकि यह अपने सत् स्वरूप माने असली , अविनाशी , अचल व्यापक तथा अखण्ड स्वरूप को भूल गया है । जो असत् है , उसी पंचमहाभूतों से निर्मित देहादि में ” हम बुद्धि हो जाने के कारण असंसारी होते हुए भी संसारी ” जीव ” कहलाने लगा है । अज्ञान के कारण अपने ” सच्चिदानन्दघन स्वरूप का तिरस्कार करके शरीर तथा अन्तःकरण आदि के धर्मों , कर्मों को अपने धर्म मानने लगा है ।

वेदान्त शास्त्र कोई नई बात नहीं बताते हैं , जो वस्तु जैसी है , उसका वैसा ही प्रतिपादन करके सच्चाई का ज्ञान कराते हैं । तात्पर्य है , कि भ्रमात्मक ज्ञान को दूर करके निर्धान्त ( भ्रान्ति रहित ) ज्ञान का निरूपण करते हैं । चिदाभास रूपी जो प्रतिबिम्बत चेतना है , वह अपने बिम्ब स्वरूप अधिष्ठान को भूल गई है , उसी को शास्त्र उपदेश करते हुए कहते हैं । ” ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या । ” जीवो ब्रह्मैव ना परा ” । ” तत्त्वमसि ‘ , सोऽहमस्मि ‘ , अहं ब्रह्मास्मि आदि महावाक्य ” जीव ब्रह्म ‘ एक ही तत्त्व ‘ हैं , ऐसा उपदेश करते हैं । वेदान्त किसी के देह , मन , बुद्धि , चित्त आदि को उपदेश नहीं करता है । देहादि ” ब्रह्म है , ऐसा वेदान्त कभी नहीं कहता है । यह देह तो जड़ , परिच्छिन्न , उत्पत्ति – विनाशशील , मकान की भाँति संघात है । जो ” जीव ” देहादि के मिथ्या धर्मों को दुराग्रह पूर्वक पकड़े हुए हैं , उन जीवों की मुक्ति के लिए वेदान्त विचार नहीं करता है । जिन्हें संसार शाश्वत् दुःखालय लगता है , प्रत्येक सम्बन्ध स्वार्थ से जुड़ा दिखाई देता है । उनको शास्त्र एवं सत्पुरुष उपदेश करते हैं । वेदान्त तो को उपदेश करता है , जो अपने को लख चौरासी के बन्धन में पड़ा हुआ “ जीव ‘ समझते हैं । जो अपने को शरीर समझते हैं , उन्हें तो उपदेश कोई कर ही नहीं सकता है , क्योंकि शरीर तो जड़ पदार्थों की श्रेणी में है । जो प्रत्यक्ष पृथ्वी आदि का विकार है ।

जो लोग विनाशी , अविनाशी , जड़ – चेतन का ” विवेक ‘ कराने के बाद भी अथवा मानस , गीता , भागवत आदि पढ़ने के बाद भी दृश्य की उपेक्षा ( वैराग्य ) करने का साहस नहीं कर सकते अर्थात् काल्पनिक देश , काल , वस्तु के प्रति सत्यत्व एवम् महत्व बुद्धि का त्याग नहीं कर सकते । उनके लिए आध्यात्मिक ग्रन्थों का पढ़ना – सुनना, सुनाना अथवा सत्संग आदि करना व्यर्थ ही है । क्योंकि उन्होंने अभी नित्य अनित्य , जड़ – चेतन अथवा माया ब्रह्म शब्द सुने हैं । इन शब्दों के तात्पर्य अथवा तात्त्विक अर्थ को समझा नहीं है । इसीलिए सभी शास्त्रों में शब्द ज्ञान को ज्ञान नहीं माना गया है । शब्द के अर्थ तथा उस अर्थ के तात्पर्य को ठीक – ठीक समझने को ज्ञान माना गया है । शब्द ज्ञान की निन्दा , अर्थ ज्ञान की प्रशंसा सभी महापुरुषों ने की है । इस ” ब्रह्म विद्या ” को मोक्ष शास्त्र कहना अनुचित न होगा ।

केवल वेदान्त ही नहीं , सभी पुराण इसी ‘ चेतन ‘ तत्व की ओर संकेत करते हुए कहते है , कि भगवान जड़ नहीं , चेतन है । भगवान् एक सद्वस्तु है – जो सर्वत्र , परिपूर्ण , व्यापक , अस्तित्व है , वहीं हरिः है । गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – ‘ जीवात्मा भी “ मैं ही हूँ । माने ” जीवात्मा ” का असली स्वरूप ” आत्मा ‘ है , वह परब्रह्म परमात्मा से एक है । जैसे – सभी प्रतिबिम्ब – बिम्ब से एक होते हैं । बिम्ब – प्रतिबिम्ब दो कभी होते ही नहीं हैं । भगवान् श्री कृष्ण ने यह भी कहा है , कि आत्मा ही वास्तव में परमात्मा है भगवान् श्री राम ने अपने शरीर के सहित सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच अर्थात् भौतिक सृष्टि को ” माया ” बताया है । फिर भी हम शास्त्र के उपदेशों , उनके तात्पर्य का विचार न कर पाने के कारण देहादि जो ” अनात्मा ‘ हैं , उसी को ” मैं – हम ” मानकर जी रहे हैं । जिसके फलस्वरूप पशु , पक्षी , वृक्ष आदि योनियों के कष्ट और दुःख भोगा करते हैं । “ जीव ” मन पर तो विश्वास करता है , परन्तु शास्त्रों तथा महापुरुषों के उपदेशों पर विश्वास नहीं करता है ।

यदि हमारे देश की उपनिषदीय विद्या अर्थात् वेदान्त ज्ञान में कोई खोट होती , तो इस ” सनातन ज्ञान की पोल कहीं , किसी देश में , कोई न कोई वैज्ञानिक अवश्य खोल देता । अन्तर्यामी श्रीकृष्ण श्रीराम , वसिष्ठ मुनि , आचार्य शंकर , भगवान् वेढ्यास तथा तुलसी आदि की वाणी गलत सिद्ध कर देता । परन्तु ऐसा हुआ नहीं , क्योंकि यह ज्ञान किसी व्यक्ति विशेष की बुद्धि की उपज नहीं है , अनुभव सिद्ध है , इसलिए सत्य है ।

भाग -2

वेदान्त का प्रतिपादन करने वाले जितने भी सद्ग्रन्थ तथा महात्मा जन हैं । उन सभी की यह घोषणा है – कि सदाचारी और कर्तव्य परायण अर्थात् स्वधर्म और सामान्य धर्म का जिन्होंने इस जन्म अथवा पिछले जन्म में विधिवत् पालन किया है , तीव्र ” भक्ति तथा निष्काम कर्म के द्वारा जिन्होंने अन्तःकरण के मल – विच्छेप दोषों को दूर कर दिया है । युवावस्था , बाल्यावस्था तथा वृद्धावस्था के दोषो का खूब विचार किया है , जिन्हें सभी भोग रोग दिखाई देते हैं । जिसके कारण तीव्र मुमुक्षा और उत्कट जिज्ञासा जागृत हो गयी है । उन्हीं विचारकों के जीवन में , यह परम गोपनीय , रहस्य युक्त विद्या चरितार्थ होती है । उन्हीं की बुद्धि , मन तथा चित्त आदि इस विद्या को ” गुरु ” मुख से सुनने तथा विचार करने में लंगते हैं । जिससे आवरण दोष दूर होता है । वरना हजारों बार सुनने व पढ़ने के बाद भी , ” बात ” वहीं की वहीं पर बनी रहती है । मान्यतायें नहीं बदलती हैं – देहादि के सहित दृश्य पदार्थों में श्रद्धा , आस्था तथा सत्यत्व बुद्धि बनी ही रहती है । आत्म निष्ठा नहीं ठहरती है । यही सभी शास्त्रों तथा वेद – वेदान्त का उद्घोष है ।

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