Guru | गुरु

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गुरु – मानव जीवन में गुरु की परम आवश्यकता है ।

गुरु – मानव जीवन में गुरु की परम आवश्यकता है । भारतीय दर्शन में गुरु उसे माना गया है, जिससे व्यक्ति शिक्षा अर्थात् किसी भी विषय का ज्ञान प्राप्त करता है । इसीलिए माता – पिता को प्रथम गुरु का स्थान दिया गया है । इसके बाद बालक – बालिका जब और कुछ समझदार होने लगते हैं, तब जिनसे उन्हें भौतिक विद्याओं की शिक्षा मिलती है, वे सभी गुरु माने जाते हैं । इसीप्रकार अस्त्र – शस्त्र अथवा अन्य टेकनिकल शिक्षायें जिनसे – जिनसे व्यक्ति को प्राप्त होती हैं, वे सभी ” गुरु ” कहलाते हैं । बिना किसी से सीखे हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं अर्थात् जान नहीं सकते हैं । यह बात सभी को निर्विवाद स्वीकार है । इससे यह सिद्ध हुआ कि “ गुरु ” के बिना मानव जीवन अन्ध और पंगु है ।

इसी तरह अध्यात्म विषयक ज्ञान ” जीव ” को तत्त्वज्ञानी गुरु के बिना नहीं हो सकता है । ऐसा हम सभी का अनुभव है । इसके लिए जो व्यक्ति ईश्वर , जीव , जगत् तथा बन्ध – मोक्ष की वास्तविकता का ज्ञान कराकर ‘जीवात्मा’ की परब्रह्म परमात्मा से एकता ( जीवात्मैक्य ) का संशय , विपर्ययरहित शास्त्र सम्मत ज्ञान, श्रुति, युक्ति, अनुभव के आधार पर करा सके , उसे’ गुरु ‘अथवा ‘सद्गुरु ‘बताया गया है । क्योंकि श्रुतियाँ कहती हैं – कोई भी ” जीव ‘ अपनी पूर्णता तथा अद्वितीयता के ज्ञान के बिना पुनर्जन्म के बन्धन से किसी भी अन्य साधन से ” मुक्त ” नहीं हो सकता है ।

इसीलिए रामचरित मानस में लिखा है

गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंच संकर सम होई ।। ( उ , 92,3 )
सदगुरु वैद्य बचन विश्वासा । संयम यह न विषय की आसा ।। ( उ , 121,3 )

यदि किसी का उद्देश्य आत्म तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करने का नहीं है , जगत के मिथ्यात्व को समझने का नहीं है अथवा हरि : भक्ति प्राप्त करने का नहीं है , अथवा अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूप को जानने का नहीं है , तो उसे “गुरु” करके बन्धन में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है । क्योंकि गुरु की आवश्यकता तो तत्त्वज्ञान अर्थात् अपने सत्य स्वरूप की जानकारी प्राप्त करने के लिए होती है , आश्रम , जाति , विरादरी , वैभव तथा आयु आदि देखकर सम्बन्ध जोड़ने के लिए नहीं ।

गुरु शिष्य बधिर अंध कर लेखा । एक न सुनइ एक नहिं देखा ।। ( उ , 98,3 )
हरै शिष्य धन शोक न हरई । सो गुरु घोर नरक महुँ परई ।। ( उ .98.4 )
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